शिखर पर तमाम जगह खाली है लेकिन वह पहुचने की लिफ्ट कही नहीं है वहां एक एक कदम सीढ़ियों के रस्ते ही जाना होगा

Monday, June 14, 2010

बाजारीकरण की *पाठशाला*


अवनीश सिंह राजपूत

शैक्षिक संस्थानों और शिक्षा के व्यवसायीकरण की हकीकत बयां करती है फिल्म 'पाठशाला'। विद्यार्थियों को जीवन एवं सामाजिक सरोकारों की सीख देने की बजाय यदि स्कूल धन उगाही का केन्द्र बन जायें तो इसे आप क्या कहेंगे? सिनेमा ने समय-समय पर विभिन्न सामाजिक विकृतियों को सिल्वर स्क्रीन पर उकेरा है और इस बार निर्देशक मिलिंद उइके की फिल्म पाठशाला के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था के व्यावसायीकरण की ऐसी ही विकृति को उजागर करने का प्रयास किया गया है।

पाठशाला में दर्शाया गया है कि स्कूलों में शिक्षा से अधिक पैसे को तरजीह दी जाती है। आज देश के अधिकतर शैक्षिक संस्थान बिजनेस इकाई के रूप में खुद को स्थापित करना चाहते हैं और इसके लिए संस्थानों की ब्रांडिंग उत्पाद की भांति की जाती है। प्रत्येक संस्थान विज्ञापनों एवं इवेंट्स के माध्यम से अपनी ब्रांड वैल्यू या कहें कि मार्किट वैल्यू स्थापित करने की कवायद में जुटा हुआ है, जिससे कि धनकुबेरों के बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर मोटी रकम वसूली जा सके। लेकिन इस तरह के चलन से व्यवसायीकरण को बढ़ावा मिलेगा और धीरे-धीरे शिक्षा गरीब छात्रों की पहुंच से दूर होती चली जाएगी।

स्कूलों में शिक्षा से ज्यादा पैसे का बोलबाला है। विज्ञापन के माध्यम से ये स्कूल लोगों को आकर्षित करने में भले ही सफल हो जाते हों, लेकिन शैक्षणिक गुणवत्ता के मामले में दूर तक इनका कोई सरोकार नजर नहीं आता। एक ऐसे ही स्कूल सरस्वती विद्या मंदिर की कहानी है फिल्म पाठशाला। फिल्म में सामाजिक सरोकार से जुड़ा एक सामाजिक मुद्दा उठाया है और उन लोगों पर निशाना साधा है, जो पैसे कमाने के लिये शिक्षा को व्यापार का माध्यम बना रहे है।

पाठशाला शिक्षा के ऐसे व्यापारियों की कहानी है जिनका छात्रों के करियर, उनकी आर्थिक, सामाजिक पृष्ठभूमि और सामाजिक विकृतियों से कोई सरोकार नहीं है, उन्हें फिक्र होती है तो सिर्फ और सिर्फ अपनी मोटी कमाई की।
विषय तो ठीक है, लेकिन जिस बात को लेकर पाठशाला फिल्म को कठघरे में खड़ा किया जा रही है, वह है इसकी पठकथा का ढीलापन। शायद यही कारण है कि फिल्म की शुरूआत तो ठीक होती है, लेकिन बीच में भटकने सी लगती है। राहुल प्रकाश उद्यावर 'शाहिद कपूर' उनकी सहयोगी अंजली 'आयशा टाकिया' और सुशांत सरस्वती विद्या मंदिर के अध्यापक की भूमिका में हैं। जबकि स्कूल के प्रधानाचार्य का किरदार नाना पाटेकर ने निभाया है।

खुद शाहिद कपूर ने फिल्म के बारे में कहा है कि 'ये फिल्म अध्यापकों के उस संघर्ष की कहानी है जहां वो बच्चों की पढ़ाई और खेल-कूद के स्तर को लगातार सुधारने की कोशिश करते हैं, लेकिन उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है' जाहिर है की इस बात के पीछे शाहिद कपूर का इशारा स्कूल प्रबंधन की ओर था। फिल्म इस बात की ओर संकेत करती है कि अध्यापक पढ़ाई, खेल-कूद और अन्य गतिविधियों में संतुलन बनाये रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन उन्हें प्रवंधन के आगे अपनी नौकरी के भय से झुकना पड़ता है।

शाहिद कपूर मानते हैं कि वर्तमान स्कूली शिक्षा की दशा पर आधारित फिल्म 'पाठशाला' एक चुनौती भरी कहानी है। शिक्षा जैसे विषयों पर आम तौर पर फिल्में बनाये जाने से इस लिये परहेज किया जाता है, क्योंकि माना जाता है कि ऐसी फिल्म बोरिगं और डाक्युमेंट्री की तरह होती है। शायद तभी ऐसी फिल्मों को मनोरंजन बनाना चुनौती होती है। बरहाल इस फिल्म में कई ऐसे लम्हें है जो छात्रों की समस्याओं पर रोशनी डालते है। स्कूल फीस का अचानक बढ़ जाना और बच्चों के माता-पिता का समय पर फीस ने दे पाने से स्कूल प्रशासन द्वारा उन्हें शमिन्दा किया जाना कुछ ऐसे ही पल है जो व्यावसायिक स्कूलों की असंवेदनशीलता की कलई खोलते है।

स्कूल प्रशासन भले ही शिक्षा के व्यावसायीकरण की ओर कदम बढ़ा रहें हो, लेकिन फिल्म पाठशाला के कलाकारों ने इस सामाजिक मसले पर संजीदा रवैया अपनाते हुए जिम्मेदारी की मिसाल पेश की है। शाहिद कपूर पाठशाला जैसी फिल्में इसलिये करना चाहते थे, ताकि उसके माध्यम से जनमानस का ध्यान इस सामाजिक बुराई की तरफ खींचा जा सके। दूसरी तरफ नाना पाटेकर को फिल्म का विषय इतना पसंद आया कि उन्होंनें इसके लिये पारिश्रमिक लेने से ही इंकार कर दिया और मेहनताने के रूप में मिले पैसे को स्वयंसेवी संस्थाओं को दान कर दिया।

स्कूल की माली हालत के खराब होने का हवाला देकर प्रशासन छात्रों से मोटी रकम वसूलने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अनाने लगता है। नाम की चाहत में स्कूल की गतिविधियां बाजार में बेची जाने नगती है। शहर के व्यापारियों से मिलकर प्रबंधान फरमान जारी कर देता है कि बच्चों को पढाई लिखाई से लेकर खेकूद का सामान यूनिफार्म इत्यादि सब कुछ स्कूल से ही खरीदना होगा जबकि यहां दाम बाजर से काफी अधिक रखने जाते हैं ।

यही नहीं स्कूलों की कमाई के कई अन्य तरीकों को भी फिल्मों में भी दर्शाया गया है। स्कूल का स्वरूप कार्पोरेट कम्पनी की तरह गढा जाने लगता है। यही नही फिल्म में उन स्कूलों की भी चर्चा की गई हैं। जो बाहर से किताबें-कापियां खरीदने पर बच्चों को सजा तक सुना देते है। इन सब कारणों सें सरस्वती स्कूल के अध्यापकों में रोष उत्पन्न हो जाता है और वे सभी बच्चों के साथ मिलकर शाहिद कपूर की अगुआई में हड़ताल कर देते है। जिससे स्कूल की छीछालेदर मच जाती है। मीडीया भी बच्चों की बेचने के लिए लालियत हो उठता हैं। अतंत: मंत्री को इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए स्कूल के प्रबंधक को फाटकार लगानी पड़ती है। बौखलाया हुआ प्रबंधक तत्काल इस शिक्षा के कमोडिफिकेशन की मुहिम को रोकने का आदेश जारी कर देता है।



कुल मिलाकर फिल्म एक संदेश तो देती है, अंत में समस्या के समाधान के लिये जनदबाव और आदोलनात्मक रवैया अपनाने के लिये भी प्रेरित करती है, लेकिन जोरदार तरीके से समस्या को उठाने में काफी कसर बाकी जान पड़ती है। शायद तभी शिक्षा के व्यावसायिकरण के दानव का मुकाबला किया जा सकता है।

बरहाल फिल्म के किरदारों में शाहिद कपूर और आयशा ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है और नाना पाटेकर ने हर बार की तरह इस बार भी अपने अभिनय से लोगों को आकर्षित किया है। मैनेजर के रूप में सौरभ शुक्ला और चपरासी की भूमिका में अंजन श्रीवास्तव ने भी अच्छी अदाकारी दिखाई है।

यहां यह टिप्पणी आवश्यक है कि निर्माता-निर्देशक-पटकथा लेखक ने विद्यालय का नाम 'सरस्वती विद्या मंदिर' रखा जो वास्तव में देश में विद्यालयों की बड़ी श्रृंखला है। इसके द्वारा संचालित हजारों विद्यालयों में भारतीय संस्कृत और संस्कार की शिक्षा दी जाती है। शिक्षा के व्यापारीकरण के खिलाफ दमठोंक कर खडे इन सरस्वती शिशु मंदिरों के उल्लेखनीय योगदान को नकारते हुए फिल्म में एक कार्पोरेट पर चलने वाले विद्यालय को सरस्वती विद्या मंदिर नाम देना अपमान जनक है। साथ ही अंग्रजी नाम वाले जिन कान्वेंट स्कूलों में यह व्यापारीकरण फल-फूल रहा है, उनसे मिलता-जुलता नाम रखने से संभवत: जान-बूझकर बचा गया है।

Saturday, June 12, 2010

कब तक खून चूसेंगे परदेसी और परजीवी



आशुतोष भटनागर

दुनियां की सर्वाधिक लोमहर्षक औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी का मुख्य आरोपी और यूनियन कार्बाइड का निदेशक वारेन एंडरसन घटना के चार दिन बाद भोपाल आया और औपचारिक गिरफ्तारी के बाद 25 हजार रुपये के निजी मुचलके पर उसे छोड़ दिया गया।
15 हजार से अधिक लोगों की मौत और लाखों लोगों के जीवन पर स्थायी असर डालने वाले इस आपराधिक कृत्य के आरोपी ऐंडरसन को केन्द्र और राज्य सरकार की सहमति से भोपाल से किसी शाही मेहमान की तरह विदा किया गया। उसके लिये राज्य सरकार के विशेष विमान की व्यवस्था की गयी और जिले का कलक्टर और पुलिस कप्तान उसे विमान तल तक छोड़ने के लिये गये। इस कवायद को अंजाम देने के लिये मुख्यमंत्री कार्यालय भी सक्रिय था और दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय भी।
8 दिसंबर 1984 के सी आई ए के दस्तावेज बताते हैं कि यह सारी प्रक्रिया स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की देख-रेख में चली। निचली अदालत द्वारा दिये गये फैसले में भी केन्द्र सरकार का उल्लेख करते हुए उसे लापरवाही के लिये जिम्मेदार माना है। जानकारी हो कि बिना उपयुक्त सुरक्षा उपायों के कंपनी को अत्यंत विषैली गैस मिथाइल आइसोसायनेट आधारित 5 हजार टन कीटनाशक बनाने का लाइसेंस न केवल जारी किया गया अपितु 1982 में इसका नवीनीकरण भी कर दिया गया।

घटना की प्रथमिकी दर्ज कराते समय गैर इरादतन हत्या (धारा 304) के तहत मामला दर्ज किया गया जिसकी जमानत केवल अदालत से ही मिल सकती थी किन्तु चार दिन बाद ही पुलिस ने मुख्य आरोपी से उपरोक्त धारा हटा ली। शेष बची हल्की धाराओं के तहत पुलिस थाने से ही उसे निजी मुचलके पर इस शर्त के साथ रिहा कर दिया गया कि उसे जब और जहां हाजिर होने का हुक्म दिया जायेगा, वह उसका पालन करेगा। मजे की बात यह है कि जिस मुचलके पर एंडरसन ने हस्ताक्षर किये वह हिन्दी में लिखा गया था।

राज्य में उस समय तैनात रहे जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी कह रहे हैं कि सारा मामला मुख्यमंत्री कार्यालय से संचालित हुआ। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रमुख सचिव रहे पीसी अलेक्जेंडर का अनुमान है कि राजीव गांधी और अर्जुन सिंह के बीच इस मामले में विमर्श हुआ होगा। चर्चा यह भी चल पड़ी है कि एंडरसन ने दिल्ली आ कर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से भी भेंट की थी । इस सबके बीच कांग्रेस प्रवक्ता का बयान आया है कि – मैं इस मामले में केन्द्र की तत्कालीन सरकार के शामिल होने की बात को खारिज करती हूं।

पूरे प्रकरण से राजीव गांधी का नाम न जुड़ने पाये इसके लिये 10 जनपथ के सिपहसालार सक्रिय हो गये हैं। उनकी चिन्ता भोपाल के गैस पीड़ितों को न्याय मिलने से अधिक इस बात पर है कि राजीव गांधी का नाम जुड़ने से मामले की आंच कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी तक न जा पहुंचे। गनीमत तो यह है कि अर्जुन सिंह ने अभी तक मुंह नहीं खोला है। किन्तु जिस तरह से अर्जुन को बलि का बकरा बना कर राजीव को बचाने के संकेत मिल रहे हैं, अर्जुन सिंह का बयान पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर सकता है।



दिक्कत एक और भी है। क्वात्रोच्चि का मामला भी लग-भग इसी प्रकार से अंजाम दिया गया था। सीबीआई की भूमिका क्वात्रोच्चिके मामले में भी संदिग्ध थी। न तो सीबीआई उसका प्रत्यर्पण करा सकी और न ही विदेश में उसकी गिरफ्तारी के बाद भी उसे भारत ला सकी। बोफोर्स घोटाले में आज तक मुख्य अभियुक्त को न्यायालय से सजा नहीं मिल सकी । किन्तु जनता की अदालत में राजीव अपने-आप को निर्दोष साबित नहीं कर सके। जिस जनता ने उनकी जवानी और मासूमियत पर रीझ कर ऐतिहासिक बहुमत प्रदान किया था उसी ने उन्हें पटखनी देने में भी देर नहीं की।


कांग्रेस के रणनीतिकारों की चिन्ता है कि मामला अगर आगे बढ़ा तो राहुल बाबा का चेहरा संवारने में जो मशक्कत की जा रही है वह पल भर में ढ़ेर हो जायेगी। वे यह भी जानते हैं कि उनकी निपुणता कोटरी में रचे जाने वाले खेल में तो है लेकिन अपनी लोकसभा से चुनाव जीतने के लिये भी उन्हें गांधी खानदान के इस एकमात्र रोशन चिराग की जरूरत पड़ेगी। इसलिये हर आंधी से उसकी हिफाजत उनकी जिम्मेदारी ही नहीं धर्म भी है।

उल्लेखनीय है कि भोपाल गैस कांड जब हुआ तब राजीव को प्रधानमंत्री बने दो महीने भी नहीं हुए थे। उनकी मंडली में भी वे सभी लोग शामिल थे जो आज सोनिया और राहुल के खास नजदीकी और सलाहकार है। राजीव और सोनिया के रिश्ते या सरोकार अगर क्वात्रोच्चि या एंडरसन के साथ थे, अथवा संदेह का लाभ दें तो कह सकते हैं कि अदृश्य दवाब उन पर काम कर रहा था तो भी, उनके कैबिनेट के वे मंत्री जो इस देश की मिट्टी से जुड़े होने का दावा करते हैं, क्यों कुछ नहीं बोले ?

कारण साफ है। कांग्रेस में नेहरू-गांधी खानदान के इर्द-गिर्द मंडराने वाले राजनेताओं से खानदान के प्रति वफादारी की अपेक्षा है, उनकी सत्यनिष्ठा की नहीं। रीढ़विहीन यह राजनेता उस परजीवी की भांति ही व्यवहार करते हैं जिसका अपने-आप में कोई वजूद नहीं होता। दूसरे के रक्त से अपनी खुराक लेने वाले इन परजीवियों को रक्त चाहिये। यह रक्त राजीव का हो, सोनिया का हो, राहुल का हो या एंडरसन का ।

देश की दृष्टि से देखा जाय तो चाहे परदेसी हो या परजीवी, उसका काम सिर्फ खून चूसना है और अपना काम निकल जाने के बाद उसका पलट कर न देखना नितांत स्वाभाविक है। यही क्वात्रोच्चि ने किया, यही एंडरसन ने। जो क्वत्रोच्चि के हमदर्द थे, वही एंडरसन को भी सहारा दे रहे थे। जिनके चेहरे बेनकाब हो चुके हैं, उनकी चर्चा क्या करना। निर्णय तो यह किया जाना है कि इन परदेसियों और परजीवियों को कब तक देश के साथ छल करने की इजाजत दी जायेगी।

Friday, June 4, 2010

‘राजमाता माइनो’ की ‘लाल साड़ी’ से खफा कांग्रेस



प्रकाश झा की फिल्म में कैटरीना का किरदार हो या फिर जेवियर मोरो की किताब.. द रेड साड़ी, दोनों में एक बात समान है और वो है सोनिया की इमेज को लेकर कांग्रेस की फिक्र।कांग्रेस परेशान है। परेशानी की वजह है स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब लाल साड़ी,जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर लिखी गई है।
कांग्रेस का कहना है कि इसमें तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया गया है। कांग्रेस ने इसके लिए ज़ेवियर मोरो को नोटिस भी भेज दिया है। इस किताब पर आपत्ति जता रही कांग्रेस,भारत में इसका प्रकाशन रोकने की कोशिश में जुटी है।

लेखक जेवियर मोरो का दावा है कि यह एक उपन्यास है, हिस्ट्री नहीं। उनका कहना है कि कांग्रेस तो चाहेगी कि सोनिया को दिल्ली में पैदा हुई ब्राह्मण बताया जाए। खुद मोरो का मानना है कि उन्हें कांग्रेस पार्टी की तरफ से धमकी भरे ईमेल्स भेजे गए हैं, जिसमें किताब की कई लाइनों पर नाराजगी जताई गई है। उन्होंने कहा है कि वह नोटिस भेजने वाले अभिषेक सिंघवी पर केस दायर करेंगे।

इस केस की अगुआई कर रहे सीनियर वकील और कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी औरउनके सहयोगियों का कहना है कि किताब में बेमतलब के और मनगढ़ंत किस्से रचे गए हैं। सब कुछ ऐसे पेश किया गया है, जैसे वाकई हुआ हो। मोरो इसे बायोग्राफी बताकर बेच रहे हैं,जिससे गलत इमेज बनती है। किताब में संजय गांधी को गालियां बकते और सोनिया को राजीव की मौत के बाद इटली चले जाने की सोचते दिखाया गया है। न सिर्फ यह किताब झूठ का पुलिंदा है, बल्कि इसे सच बताकर पेश किया गया है। मामला नेहरू-गांधी फैमिली की इज्जत से खिलवाड़ का बनता है।
ज्ञातव्य है की स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब एल सारी रोसो यानी द रेड सारी,सोनिया गांधी की जिंदगी पर लिखी गई नॉवेल नुमा किताब है। यह 2008 में छपी थी। इटैलियन, फ्रेंच और डच में इसकी दो लाख से ज्यादा कॉपियां बिक चुकी हैं और अब इसका इंगलिश ट्रांसलेशन छपने के लिए तैयार है। मोरो और उनके पब्लिशर्स को लीगल नोटिस मिला है, जिसमें किताब वापस लेने को कहा गया है।
किताब के टाइटल में जिस लाल साड़ी का जिक्र है, उसे लेखक के मुताबिक पंडित नेहरू ने जेल में बुना था और सोनिया ने अपनी शादी के दिन पहना था। यह कहानी है, इटली के एक छोटे से गांव में पैदा हुई लड़की के हैरतअंगेज सफर की जिसे शक्ति तो मिली, लेकिन मौतों के सिलसिले से गुजरकर। किताब का सब-टाइटल है- लाइफ इज द प्राइस ऑफ पावर यानी ताकत की कीमत है जिंदगी।

आज रिलीज हो रही प्रकाश झा की फिल्म राजनीति को कांग्रेस की टेढ़ी नजर का सामना करनापड़ा है। हालांकि नेहरू-गांधी फैमिली ने सीधे कुछ कहने से परहेज किया है, लेकिन कांग्रेसी अपनी नाराजगी छुपा नहीं रहे हैं। माना जाता है कि फिल्म में काट-छांट की गई है। झा सेंसर की सख्ती से खफा हैं।


इमर्जेंसी के दिनों में ' किस्सा कुर्सी का ' बनाकर सरकार का डंडा खा चुके जगमोहन मूंदड़ा का इरादासोनिया पर इसी नाम से फिल्म बनाने का था। सोनिया के रोल के लिए इटैलियन ऐ क्ट्रेस मोनिकाबलुची को साइन भी कर लिया गया था। फिर मूंदड़ा ने सोनिया से मुलाकात की और कुछ ही दिन बादउन्हें सिंघवी का नोटिस मिल गया। कई बरस हो गए , इस फिल्म का जिक्र नहीं हुआ।
बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने मोरो की किताब के विषयवस्तु पर टिप्पणी करतेहुए कहा कि कांग्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। प्रसाद नेशुक्रवार को रिलीज होने वाली फिल्म 'राजनीति' का उल्लेख करते हुए कहा कि सेंसर बोर्ड में कांग्रेस के सदस्यों ने इस फिल्म से जबर्दस्ती कुछ अंश कटवा दिए। कांग्रेस का ऐसा रवैयाआपातकाल के दिनों की याद दिलाता है, जब प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई थी और कुछ वरिष्ठ संपादकों को गिरफ्तार कर लिया गया था।
लेकिन मामला कांग्रेस का है तो उसके मानदंड बदल गए हैं। दरअसल इस किताब के लेखक मोरो नेलिखा है कि राजीव की मौत ने सोनिया को झकझोर दिया था। वो सब कुछ समेट कर, वापस इटलीजाने की सोचने लगी थीं। कांग्रेस के लिए ये बात पूरी तरह गलत है। उसका तर्क है की एक जीवितशख्सियत की जिंदगी को काल्पनिक बनाने की कोशिश ठीक नहीं है। बात सोनिया गांधी से जुड़ी हुई है,इसलिए भी ये बात बढ़ गई है। सवाल बड़ा सीधा सा है कि क्या किसी व्यक्ति विशेष का कद लोकतंत्र से भी बड़ा हो सकता है।

Thursday, May 20, 2010

हरिद्वार का पौराणिक इतिहास


शिवालिक पर्वत-माला के विल्व पर्वत के मध्य कल-कल निनाद करती पापों का शमन करने वाली धवला गंगा प्राचीन काल से ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं, गृहस्थों यहां तक कि सिध्द-गंधर्वों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। अपनी शीतलता व मोक्ष प्रदान करने की शक्ति के कारण ही व्यक्ति अनायास ही मॉ गंगा की शरण में खिंचा चला आता है। हरिद्वार की मुख्य पहचान मॉ गंगा के कारण तो है ही, साथ ही मंदिरों व साधु-संतों की नगरी के कारण भी कही जाती है। गंगा की धवल धारा, कल-कल निनाद, मंदिरों से सुबह-शाम आती शंख व घण्टा-ध्वनि, संतों की अमृत-वाणी यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करने के साथ शांति प्रदान करती है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष करोड़ों लोग देश-विदेश से यहां आते है।
हरिद्वार के संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं हैं। विभिन्न मत-मतान्तर, सम्प्रदायों का पवित्र स्थल होने के कारण इसको विभिन्न नामों से जाना जाता है। ऋषि-मुनियों की तपस्थली व देवभूमि का प्रवेश-द्वार तथा देवताओं का निवास-स्थान होने के कारण इसे स्वर्गद्वार भी कहा जाता है। पांडवों के स्वर्ग-गमन के लिए इसी स्थान से होकर जाने के कारण इसे स्वर्ग द्वार कहा जाता है। हिमालय में स्थित चार धामों में से एक केदारनाथ धाम जाने वाले श्रध्दालु व शैव मत के लोग इसे ''हरद्वार'' अथार्त् शिव का द्वार भी कहते हैं। बद्रीनाथ धाम यात्रा का प्रवेश द्वार होने के कारण तथा बद्रीनाथ जाने वाले वैष्णव लोग भगवान् विष्णु के हरि नाम पर इसे हरिद्वार कहते हैं।
मॉ भागीरथी हिमालय से निकलने के पश्चात् संकरे पहाड़ी मार्गों से होकर हरिद्वार के मैदान में प्रवेश करती है तथ्ज्ञा यहीं से ही गंगोत्री धाम का प्रवेश प्रारम्भ होता है, इस कारण इसे गंगा-द्वार भी कहा जाता है। उज्जैन के राजा भर्तृहरि अपना राजपाट छोटे भाई विक्रमादित्य को सौंपकर यहां मॉ गंगा की शरण में चले आए थे और यहीं तप करते हुए उन्होंने अपनी देह का त्याग कर दिया। भाई के याद में राजा विक्रमादित्य ने ब्रह्मकुण्ड पर पैड़ियों का निर्माण करावाया जिसे भर्तृहरि की पैड़ी कहा जाता था। कालान्तर में यही भर्तृहरि की पैड़ी हरि की पैड़ी के नाम से विख्यात हुई।
राजा विक्रमादित्य ने भाई भर्तृहरि के याद में एक महल भी बनवाया था। भर्तृहरि का वह महल आज भी भग्नावेषों के रूप में हरकी पैड़ी के समीप डाटवाली हवेली के नाम से खड़ा है। स्कन्द पुराण के केदार खण्ड में हरिद्वार का वर्णन मायापुरी के नाम से मिलता है। मतानुसार मय दानव की निवास-स्थली होने के कारण इसका नाम मायापुरी पड़ा। कनिंघम के अनुसार हरिद्वार को कोह-पैरी कहा गया। कोह का अर्थ पहाड़ होता है। उस समय हर की पैड़ी पहाड़ की तलहटी में एक छोटे से कुण्ड के रूप में रही होगी। अकबर के काल इतिहासकार अबुल फजल ने ''आइने अकबरी'' में लिखा कि माया ही हरिद्वार के नाम से जानी जाती है।
अकबर की मॉ गंगा के प्रति अगाध श्रध्दा थी। अकबर के नवरत्नों मे से एक राजा मानसिंह ने हरि की पैड़ी का जीर्णोध्दार करवाया था। कनिंघम ने लिखा है कि मानसिंह ने गंगा की धारा के बीच एक अष्टकोणी स्तम्भ बनवाया था। वही स्तम्भ गंगा मंदिर के रूप में आज भी है। गंगा मंदिर के नीचे राजा मानसिंह के अस्थि-अवशेष भी गड़े हुए है। गंगा मंदिर राजा मानसिंह की छतरी के नाम से भी माना जाता है। कहते है कि मृत्यु के पश्चात् जब राजा मानसिंह के अस्थि-अवशेष गंगा में विसर्जित करने के लिए हरिद्वार आये तो यहां के तीर्थ पुरोहितों ने उसके अस्थि विसर्जन कराने से इंकार कर दिया। इंकार की वजह मानसिंह का अपनी बहन जोधाबाई का अकबर के साथ विवाह करना था।
तीर्थ पुरोहितों द्वारा अस्थि-विसर्जन करवाने से इंकार करने के बाद मानसिंह की अस्थियां गंगा मंदिर के नीचे गाड़ दी गई। दक्ष-यज्ञ में सती द्वारा योगाग्नि से स्वयं के प्राणों का उत्सर्ग करने के पश्चात् उनकी देह को भगवान शिव द्वारा सती के वियोग में उनके देह को लेकर जाते समय संसार की चिंता करते हुए भगवान् विष्णु की आज्ञा से सुदर्शन चक्र ने सती की देह के टुकड़े किए जिनमें सती की नाभि यहां गिरने के कारण इसे मायापुरी कहा जाता है। कहते हैं कि हरिद्वार में कपिल मुनि का आश्रम होने के कारण यह स्थान ''कपिला'' के नाम से भी प्रसिध्द था।
कपिलाश्रम हरिद्वार का नाम पहले-पहल आता है। जब सूर्यवंशी राजा सगर के अश्वमेघ यज्ञ के छोड़े गए अश्व को कपिल मुनि के आश्रम में बांधे जाने का उल्लेख मिलता है। जब भगवान् राम के पूर्वज तथा इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ के बाद दिग्विजय के लिए अश्व को छोड़ा तो उसके साथ अपने साठ हजार पुत्र भी अश्व रक्षा के लिए भेजे। राजा सगर के यज्ञ से घबराए इन्द्र ने यज्ञ के अश्व को चुराकर हरिद्वार क्षेत्र स्थित कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया।
अश्व के चोरी होने की खबर लगते ही सगर-पुत्रों ने अश्व की खोज आरम्भ की। अश्व को ढूंढ़ते हुए सगर-पुत्र कपिल मुनि के आश्रम जा पहुंचे। अश्व को आश्रम में बंधा देख सगर-पुत्रों ने मुनि को अपशब्द कहे। समाधि से उठने के बाद मुनि कपिल क्रोधित होकर सबको श्राप देकर भस्म कर दिया। सगर के वंशज राजा ने अपने पुरखों के उध्दार के लिए कठिन तपस्या की तथा मॉ गंगा को धरती पर लाए। स्वर्ग से उतरकर मॉ गंगा भगवान् शिव की जटाओं से होते हुए राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चल दी।
जब राजा भगीरथ गंगा को लेकर हरिद्वार पहुंचे तो उनके सगर-पुत्रों के भस्म हुए अवशेषों को गंगा के स्पर्श मात्र से मोक्ष प्राप्त हो गया। तब से आज तक हरिद्वार मे अस्थि-विसर्जन की परम्परा चली आ रही है। देश के कोने-कोने से लोग अपने मृत परिजनों के अस्थि-अवशेष लेकर यहां गंगा में विसर्जित करने के लिए आते है।
मुगल शासक तैमूर लंग के साथ 1399 में हरिद्वार आए इतिहासकार शर्फुद्दीन ने हरिद्वार को ''कायोपिल'' व ''कुपिला'' कहा। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सन् 634 में अपनी भारत यात्रा के दौरान हरिद्वार का उल्लेख ''मो-यू-लो'' के नाम से किया है। 1608 में युरोपियन यात्री टार्म कार्बेट ने यहां आने पर हरिद्वार को ''कैपिटल आफॅ शिवा'' के नाम से संबोधित किया है। कहते है कि ब्रह्मकुण्ड जहां वर्तमान हर की पैडी है वहां पर हर अर्थात् शिव व हरि अर्थात विष्णु ने जल-क्रीड़ा की थी, इस कारण इसे हरद्वार व हरिद्वार कहा जाता है।

हरिद्वार से सटा हुआ लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर पौरणिक स्थल कनखल है। कहा जाता है कि यह स्थान हरिद्वार से अधिक प्राचिन है। कनखल भगवान् शिव की ससुराल व ब्रह्मा के पैर के दाहिने अंगूठे से उत्पन्न प्रजापति राजा दक्ष की राजधानी थी। कहा जाता है कि कनखल का नाम एक ''खल'' नामक राक्षस के नाम से पड़ा। इस पवित्र क्षेत्र में आने पर यहां के कण मात्र के स्पर्श से उसे मुक्ति मिली थी। इस कारण इस क्षेत्र को कनखल कहा जाता है। महाकवि कालीदास ने अपनी रचना अभिज्ञान-शाकुंतलम् में भी कनखल का उल्लेख किया है। स्कन्द व शिव पुराण में भी कनखल का वर्णन किया गया है।
20 मई, 2010

नक्सली दंश से कराहता देश


20 मई, 2010
देश के लिए सबसे बड़ा खतरा और राजनेताओं के लिए राजनीतिक रोटी सेंकने वाला सबसे बड़ा तवा है नक्सलवाद। नक्सलवाद जहां देश को खोखला करने में लगा है वहीं हमारे प्रतिनिधि अभी तक यह फैसला नहीं कर पाये हैं कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए।

नक्सलियों पर राजनीति की रोटियां सेंकने वाले इसे गांधीवाद से सुलझाने का सुझाव तो देते हैं, लेकिन शायद वे उन वीर सपूतों के लहू की कीमत को नहीं जानते जो नक्सली हमलों में शहीद हुए हैं, और ना ही उन्हें शहीदों के परिजनों के दर्द या सिसकियों का एहसाह है। वे तो सिर्फ सुझाव या सलाह देना जानते हैं।

देश के राजनेता किसी बड़े नक्सली हमले के बाद शहीदों के शवों पर श्रद्धाञ्जलि के नाम पर फूलों का बोझ बढ़ाने जाते हैं, और नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए बड़ी-बड़ी कसमें खाते हैं। लेकिन जब नक्सलवाद के खिलाफ ठोस रणनीति या कार्रवाई करने का समय आता है तो हमारे नेता गांधीवादी राग अलापने लगते हैं।

पिछले पांच महीनों में 100 से ज्यादा जवान नक्सली हमलों में शहीद हुए हैं। इनमें सीआरपीएफ के जवानों की संख्या सर्वाधिक है।

नक्सल प्रभावित राज्यों में जवानों के शहीद होने का यह सिलसिला पश्चिम बंगाल के सिल्दा कैंप पर हमले से शुरू हुआ। इस हमले में 24 जवान शहीद हुए थे। चार अप्रैल को ओडिशा के कोरापुट जिले में नक्सलियों ने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप के 11 जवानों की हत्या कर दी।

इसके दो दिन बाद ही छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ के 75 जवान शहीद हो गए थे। छत्तीसगढ़ के ही बीजापुर जिले में नक्सलियों के आईईडी ब्लास्ट में सीआरपीएफ के आठ जवान शहीद हुए, जबकि सोमवार को नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में लोगों से भरी बस को उड़ा दिया, जिसमें 12 एसपीओ समेत 36 लोगों की मौत हो गई।

तेजी से बढ़ते नक्सली हमलों और उन पर सरकार के ढुलमुल रवैये ने जवानों की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है, जिसके बावजूद जवानों के नक्सलियों के खिलाफ अभियानों और अपनी देशवासियों की सुरक्षा के जज्बें में कोई कमी नहीं दिख रही है।

सोमवार को दंतेवाड़ा में बस पर हुए नक्सली हमले के बाद बस में सवार एसपीओ के जवान नक्सलियों का मुकाबला नहीं करते तो हताहतों की संख्या और बढ़ सकती थी। राज्य पुलिस के आईजी आरके विज ने संवादाताओं को बताया कि आईईडी ब्लास्ट से बस हवा में उछलकर पलट गई थी। हमले के फौरन बाद एके-47 राइफलों से लैस नक्सलियों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी थी। लेकिन हमले में बच गए कुछ एसपीओ जवानों ने हिम्मत नहीं हारी और उनका दिलेरी से सामना किया। इसी का नतीजा था कि नक्सली भाग खड़े हुए और घायलों को फौरन अस्पताल ले जाना संभव हो सका।

राष्ट्रमंडल खेल: सज रही दिल्ली उजड़ रहे गरीब



अवनीश सिंह

जैसे-जैसे कॉमनवेल्थ गेम्स की घडियां नजदीक आती जा रही हैं, वैसे-वैसे खेल से जुडी परियोजनाओं के आयोजकों की परेशानी बढती जा रही हैं। दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिये राजधानी को सुंदर बनाने के नाम पर 20 लाख से अधिक मजदूरों को काम में लगाया गया है।

सूचना का अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार, निर्माण में लगे मजदूरों के पसीने से दिल्ली चमक रही है और इनके नाम पर सरकार ने उपकर लगाकर अपने खजाने में 500 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि इकट्ठा कर ली है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक ग़रीबी उन्मूलन की योजनाओं से करोड़ों रुपए की धनराशि दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लगाई जा रही है।

ज्ञातव्य है कि निर्माण में लगे मजदूर एवं उनके परिवारों के कल्याण के लिए दिल्ली सरकार ने वर्ष 2002 में दिल्ली भवन एवं सन्निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड का गठन किया था, जिसकी जिम्मेदारी मजदूरों का बोर्ड में पंजीकरण करवाना और उनके लिए कल्याणकारी योजना बनाकर क्रियान्वित करना है। इसके लिए सरकार को अलग से धनराशि की व्यवस्था भी नहीं करनी है। क्योंकि दिल्ली में हो रहे सभी निर्माण कार्य चाहे वे सरकारी एजेंसी द्वारा किए जा रहे हों या गैर सरकारी एजेंसी द्वारा, उनके निर्माण लागत का एक प्रतिशत उपकर के रूप में निर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड में जमा कराने के निर्देश हैं। अब तक कॉमनवेल्थ गेम्स के निर्माण स्थल पर 20 लाख मजदूरों में से केवल दस से पंद्रह प्रतिशत मजदूरों का ही पञ्जीकरण रजिस्ट्रेशन किया गया।

राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन जिसके लिए कई वर्षों से बड़ी धूमधाम से तैयारी चल रही है। भारत सरकार और दिल्ली सरकार ने इन खेलों के समय पर निर्माण कार्य पूरा करने के लिए पूरी ताकत और धन झोंक दिया है। एक अनुमान के मुताबिक, इसमें कुल एक लाख करोड़ रूपये खर्च होंगे। कहा जा रहा है कि यह अभी तक के सबसे महंगे राष्ट्रमंडल खेल होंगे। यह भी तब जब भारत प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से दुनिया के निम्नतम देशों में से एक है। विश्व भूख सूचकांक में हमारा स्थान इथोपिया से भी नीचे है एवं ७७ प्रतिशत के लगभग भारत की जनसंख्या २० रूपये रोजाना पर गुजर-बसर करने पर मजबूर है।

दूसरी ओर हमारे देश में लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। आज दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे, कुपोषित, आवासहीन एवं अशिक्षित लोग भारत में रह रहे हैं। गरीबों को सस्ता राशन, बिजली, पेयजल, इलाज के लिए पूरी व्यवस्था, बुढ़ापे में पेंशन और स्कूल में पूरे स्थाई शिक्षक और भवन व अन्य सुविधाएं देने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है। फिर सरकार के पास इस बारह दिवसीय आयोजन के लिए इतना पैसा कहां से आया?

ग़रीबी उन्मूलन की योजनाओं के करोड़ों रुपए को राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लगाये जाने की रिपोर्ट 'हाउसिंग ऐंड लेंड राइट्स नेटवर्क' नामक संस्था ने तैयार की है। संस्था का कहना है कि उसने इस बारे में सूचना का अधिकार क़ानून के तहत सरकार से जानकारी उपलब्ध की है। इसके मुताबिक ग़रीबी उन्मूलन की योजनाओं से करोड़ों रुपए की धनराशि दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लगाई जा रही है।

यह रिपोर्ट केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा करती है और राष्ट्रमंडल खेलों के लिए योजनाएँ बनाने और धन जुटाने के तरीक़ों पर सवाल खड़े करती है। रिपोर्ट के मुकाबिक, समाज के पिछड़े तबकों और ग़रीब वर्ग की मदद के लिए रखे गए करोड़ों रुपयों की राशि को इन आयोजनों में लगाया जा रहा है। संस्था ने इस पूरे मामले की स्वतंत्र जाँच की मांग की है। दिल्ली में सरकारी अधिकारियों का कहना है कि वे इन आरोपों पर ग़ौर कर रहे हैं।

राष्ट्रमंडल खेलों से संबंधित परियोजनाओं के कारण एक लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रमंडल खेलों पर हो रहा ख़र्च नियंत्रण के बाहर चला गया है और खेलों का बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए पहले प्रस्तावित राशि के मुकाबले में अब 2000 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ोत्तरी हुई है।

साथ ही खेलों की वजह से एक लाख से अधिक लोगों को अपने घरों को छोड़ना पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस साल अक्तूबर में शुरु होने वाली खेलों से पहले 40 हज़ार और परिवार विस्थापित हो सकते हैं। इस रिपोर्ट को सयुंक्त राष्ट्र के एक पूर्व मानवाधिकार अधिकारी मिलून कोठारी ने तैयार किया है। उन्होंने एक रेडियों वार्ता में बताया कि संस्था के पास इन आरोपों की पुष्टि करने के लिए स्पष्ट सबूत हैं। कोठारी के मुताबिक, दिल्ली को एक विश्व-स्तर के शहर के रुप में दिखाने की होड़ में सरकार लोगों के प्रति अपनी क़ानूनी और नैतिक प्रतिबद्धता को भूल रही है।
नई दिल्ली। 15 मई, 2010